एक उदास शहर - पटना
शहर उदास है...कब से.
कहां गये लोग, पूछ्ता है सबसे...
जवाब देगा भी तो कौन
शान्त है दिशाये, रस्ते है मौन....
कभी देखते थे सपने ईन गलियों मे हम
अब ये रस्ते भी पूछ्ने लगे हैं की कौन हो तुम...
खिडकी से शायद कोइ झांकता है हमे...
कोइ और नही वक्त की होगी परछाई
कब तक मुह मोडे रक्खोगे यार
कौन जोडेगा टुटे शीशे और टुटती दिवार
बुढे होते माँ-बाप रह गये है कितने अकेले,
हमारे बिन वक्त की मार कबतक और कैसे झेले
लौटे नही तो हो जाएगा ये शहर जल-जल के खाक
हांथ मे पाओगे, सिर्फ उडती हुई राख...
सिर्फ उडती हुई राख...
सिर्फ उडती हुई राख...
- नितिन